जद आंगण में तो रात जगो
मैं सोवण शंख बजा बैठ्यो
सुण लोग मुळकणो चावै था
मैं रोवण राग सुणा बैठ्यो।
भोम बिछाई अम्बर ओढ्यो
रिमझिम बिरखा स्याळै में
घणै पसेवां-न्हाण संजोयो
तायो डी'ल उन्हाळै में
जद-जद छाया नेड़ै आई
उठ और परै-सी जा बैठ्यो
जद आंगण में तो रात जगो
सींची फसल अभावां की
रूंख भूख का हुया हर्या
तन-मन ताप बढ्यो इतणू
हिम पीड़ गळी अर नैण झर्या
कळियां कै भोळ भुलावै में
कांटा को बाग लगा बैठ्यो
जद आंगण में तो रात जगो
सदियां सूं तम पीतो आयो
अेक किरण री आशा में
रगत तेल सूं दीप भर्यो
जोत जगाई सांसा में
बावळ बेड़ै बैं ज्योति सूं
घर में आग लगा बैठ्यो
जद आंगण में तो रात जगो
सोचै थो जोध जवानी में
अम्बर तारा तोडूंगो
रंग रूप छळकती प्याली में
अमरित प्यार निचोड़ूंगो
पण पग-पग दूरी और बढ़ी
आखी उमर गवां बैठ्यो
जद आंगण में थो रात जगो
मै सोवण शंख बजा बैठ्यो।