जो जावै पाछो नीं आवै, ये मंजलां किण भांत री।

जाणै कुणसै देस गया सब जातरी॥

आवै जद सूं चालण लागै, धर मंजलां धर कूंचा रे।

कुण नै बेरो नपती रो, डूंगर कितरा ऊंचा रे।

गैल नै पूछै कोई किणनै, आस करै अणजाण्या री।

जो नी पकड़ै रपटण वेळा कदै किणां रा पूंचा रे।

मग पर डग डगमग नी होवै, जबलग सासां सांतरी।

जाणै कुणसै देस गया सब जातरी॥

सामानां अर सम्बन्धां री, माथै पोटां भारी रे।

चालै सगळा घिसट-घिसट कर जूण घुळादी सारी रे।

रोज चालबा वाळा कदै नै, लेवै रे बोझो सागे।

पण चालै सब बाळद ले कर, मत गई यां री मारी रे।

भरमावै मत ईं गैलां में झूठी है सब खातरी।

जाणै कुणसै देस गया सब जातरी।

कुण जाण्या है गैल-बावळा, लाल बुझक्कड़ है सारा।

संत पंथ सब कहे अणूती, यांका है फंदा न्यारा।

जो मन कहवै चाल उठीकै, सोच मती राखै कोई।

जो डूबै ही तिर पावै, यो जीवण बैती धारा।

चाल्यां जा बस यूं भी चालै, ज्यूं चाकी दन-रात री।

जाणै कुणसै देस गया सब जातरी॥

कठै गया सब, सभी अठै है, कण-कण में ज्यांरी छाया।

भीतर रा पट खोल देख ले, पांच तत्त री सब माया।

धरा नीर नभ अगन पवन रा, चक्कर में घूमै सगळा।

यो सब रो है देस, भेस बस बदळै है सब री काया।

बांध सकै कुण सांकळ कुण रे, बात नहीं या हाथ री॥

जाणै कुणसै देस गया सब जातरी॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कैलाश मण्डेला ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-27
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