हरदां की धरा पै
उश्यों ई
न्हं होवै
कविता की फूटैड़
सुख की फसल
कै लेखै
उपाड़णी पड़ै छै
अपणै-हाथां
अबखाया का छाड़।
जदी तो महके छै
जिन्दगाणी को बगीचो
कविता को
सबद-सबद पष्प-पष्प।
ज्यां सबनै
दिखाणी पड़ै छै
धसूळ्यां को
सावचेत
पहरो होता सता बी
अपणी-अपणी सौरम की मरजाद।