लागै है के

‘ब्रिस्टल’ में बैठणै री

‘बार’ रै किनारै ऊभा रैवण री

आदत म्हनै नीं पड़ सकै।

म्हैं प्यालियां नै उलट देवूंला

मेज माथै मुक्कौ मार कैवूंला—

“सुणौ साहित्तिक साथियां!

बैठा थे

चाय में आंख्यां गडायां,

कलम घिसतां-घिसतां

थांरी मखमली खूणियां घिसगी।

प्यारां

सबदां हाथ पकड़्या थे क्यूंकर,

जिकौ चिप्योड़ा इज रैवौ हो

भींतां

अर भींतां रा कागदां सूं?

थांनै पतौ है कांई?

‘फ्रांक्वाय बिला’ लिख’र

म्हैं लागगौ हो लूट रै काम में?

अर थे, जिका के पेंसिल रा

चक्कू नै देख’र धूज जावो हो,

मध्य-युग रा संरक्षक कैवीजण रा

दावेदार हो;

आज रै बारै में लिखण सारू

थांरै कनै है कांई, बोलौ?

किणी सोलीसिटर रै सहायक नै

जिंदगाणी में

सौगुणा वत्तौ मजौ आवै है।

सभ्य कविगण!

हाल तांई थांरौ मन नीं भरीजियौ

दूतां सूं, मै’लां सूं, प्रेम सूं

थांरै जैड़ा लोग इज जे

हुया करै है कवि तौ पछै म्हैं

थूकूं हूं सगळी कळा माथै!

उणरी जगै म्हैं खोलूंला दुकान,

लागूंला सट्टेबाजी में,

अर खुद कनै मोटा-तगड़ा नौकर जोड़ूंला।

किणी सराय रै लारली कानीं

आपरी आत्मा री उल्टी करूंला

दारूड़ी राग में!

कांई इण मुक्कै रौ असर होवैला?

कांई थांरा बाळां री नोकां रै मांय

घुस सकैला?

पण थांरा बाळां रै जंगळ नीचै

कोरो अेक इज विचार है—

बाळां नै संवारणा, पण अै किण सारू?

थोड़ै इज समै सारू,

तद फळ री तुलना में मैणत वत्ती है

अर अणंत काळ तांई

बाळां में संवार रैवै,

संभव नीं है!”

स्रोत
  • पोथी : अपरंच अक्टूबर-दिंसबर 2015 ,
  • सिरजक : ब्लादिमीर मायकोवस्की ,
  • संपादक : पारस अरोड़ा ,
  • प्रकाशक : अपरंच प्रकासण
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