बिना गांडीव री गीता

नीं कुरुक्षेत्र,

नीं शंखनाद,

नीं अरजुन रौ

रथ हांकता सारथी कृष्ण

तौ हर मन में जुद्ध अर

जुद्ध रौ भय यथावत है।

कोई हाथ में तीर कोनी,

पण मिनख हर दिन,

अपणै ही हिरदै नै भेदतौ रेवै।

भूख, डर, प्रेम

अर लाचारगी रै बीच ऊभौ,

धजा पर टंक्योड़ौ धरम कैवै—

कर्म कर

चालतौ रै....

विवेक केवै—

रुक, सोच,

नै आत्मा चुपचाप

देखती रेवै

कै जीत किण री व्हैला?

अठै

श्रीकृष्ण उपदेस नीं देवै,

अठै

चुप्पी ही

सब सूं मूंगी वाणी है।

अठै जो करियौ,

उण रौ फळ

सुरग-नरक में कोनी,

आगली सांस में

या इण इज जलम

भोगणौ पड़ै।

अठै त्याग

अहंकार सूं बच्योड़ौ कोनी,

अठै मोह,

कर्तव्य रौ वेस धर्‌योड़ौ है।

बिना गांडीव री गीता बांचणी

और दोरी है।

क्यूंकै अठै

दुस्मण आम्ही-साम्ही कोनी,

छुप्योड़ौ है।

अठै सारथी, भगवान कोनी।

बिना तीर, बिना शंख,

बिना श्लोक रौ मात्र छळ है।

स्रोत
  • पोथी : कऊ री झाळ ,
  • सिरजक : प्रमिला शंकर ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रंथागार ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
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