कदैई म्हनै लागै कै लड़ाका वै

जे पाछा नी फिर्‌या रगत रंगियोड़ा खेता सूं

गाडिजिया नीं भाया री कबरां में

बदळ पलटीजिया धौळा सारसां में

वै आज भी उण थेट बोलाट सूं

उडै है अर म्हनै हेला पाड़ै।

स्यात इणी खातर घणी बेळा उण पीड़ सूं

आभै नै निरख आपां गुमसुम व्है जावां।

म्है देखूं हूं पराई धरती माथै

सिंझ्या रा धुंधळका में सारस

उडै है लेणोलेण

जाणै उण खेतां में कदैई चाल्या व्हैला मिनखजमारै।

उडै है वै काटता आपरौ लाम्बौ मारग

अर रै रै'र कुरळावै; लेवै किणीं रौ नांव

कठैई इण खातर तो सारस नीं करै कुरळाटौ

के वै अवांरा री भासा रै जुगां सूं नजीक है।

उडै है थेठ गिगन में अेक थाकोड़ौ सो बाण

म्हारा जूना मिन्तर म्हारा जूना व्हाला

अर वांरी पंगत में अेक छोटौ सो सूनापणौ

स्यात् उणी जगा उडणौ म्हारा भाग में है।

बखत आवैला अर

म्हैं उड जाऊंला इण सारस रै सागै

अणथाग आभै रै पार

अर पुकारूंला आभै सूं चिड़कल री बोली में

थांनै, ज्यांनै छोड़ आयौ हूं धरती माथै।

स्रोत
  • पोथी : रसूल अमजातोव अर विदेसी कवितावां ,
  • सिरजक : रसूल हमजातोव ,
  • प्रकाशक : रॉयल पब्लिकेशन, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
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