पंच तत्व का दो पुतळा!

अेक बिना कफन की लास

जो अगनी कै अरपण हो सक्यो।

अर, दूजो बिना दफन को मुरदो

जो धरती की गौदी सो सक्यो।

वै दोन्यूं जळ की धारा में बहता-बहता

अेक मोड़, पर आपस मैं टकराग्या।

अर परलौकी भासा मैं पट्ठा

अेक दूसरा सूं बतळाग्या।

अेक बोल्यो कै

अरै यार कहबा की कोनी, सहबा की है

छानै की, पण नीं मांनै तो बता रियो हूं

अरै यार सुण!

आजकाल कीं ईं अगनी मैं सौर कोयनी!

म्हांरी काया नै बाळ नींं सकी।

बात सुणीनै अरै चमकजे मती

आग में आग कोयनी।

सोच समझ कर मरज्यो मितरां

बिन लकड़ी कै दाग कोयनी॥

अरै यार बीड़ां की बाड़ां घटगी।

लो दरखत तो ये दोस्त आपणा

हत्यारां का हाथां सूं कांकड़ की काया कटगी॥

अस्या पेड़ अर उसी पौध का

जंगळी जंगळ कटग्या

लारै जीव जनावर नटग्या।

अर वांकी ठौरां

ईंटां-भाटा, सींमट-चूना, कंकरीट का

शहरी कांकड़ सटग्या॥

दुरभाग देख भावी भारत का ये निरमोही नक्सा।

गांव छौड़कर शहर भागता मांथै पेटी बक्सा॥

झुग्गी झोपड़ियां में डेरा।

फुटपाथां का रैन बसेरा॥

सहर और गांवां का बिच में बंटग्या

बोल्यो कै

अब तो यारा करणौ पड़सी बिना आग कै दाग।

कहतां-कहतां मुरदा कै मूंडै आग्या झाग॥

अब तो नम्बर दो पर है दूजा मुरदा की बारी।

पट्ठो परथी पुराण की पढ़दी पौथी सारी॥

अरै यार! थारी तो सुणली, अब म्हांरी भी सुण।

मूं पूछूं कै अरै कबीरा।

कठै-कठै थूं कतरी कबरां चुण?

थूं कहवै कै अगनी मैं सौर कोयनी!

अर मूं कहवूं कै धरती पर ठौर कोयनी॥

थारी काया नै अगनी बाळ नीं सकी।

अर म्हांरी मांटी नै धरती गाळ नीं सकी।

तो काया बळ सकी।

अर मांटी गळ सकी॥

तब वह रो पड़ा ज़फ़र की गज़ल के प्यार में।

दो गज जमीं मिल सकी उस कूंचे यार में॥

यूं करतां—

भूगोल में भी वे दो गज जमीं को तरसते रहे।

और इतिहास में भी उन पर खून के आंसू बरसते रहे॥

सुणी ही कै धरती तो परथी माता है

लो ईंको छुटपुट छौर कोयनी।

पण हकीकत या है कै

ईं धरती पर आपणी पांती में

दो मीटर छौड़’र, दो सैन्टीमीटर भी ठौर कोयनी!

अब असी दसा में

थूं ही मन्नै बोल बता रोऊं तो कुणनै रोऊं?

अर, मर्‌यां पछै भी अरै यार सोऊं तो कठै सोऊं?

अगनी परथी तो निवड़ गिया

अब जळ अर वायू को नम्बर है।

और अन्त में

यो अनन्त आकाश तत्व नीलो अम्बर है।

अगनी नटगी, परथी घटगी

अब आपांकी पांती में

यो कळ-कळ करतो जळ आयो है

जो भी मैलो होग्यो।

अर कळ कारखानां की अणूंती किरपा सूं

पूरो वायू मंडल देखो खूब विसैलो होग्यो॥

जळ दाग जनावर तक को

देखो नदियां में कांई तर रही है?

लाख हजारां लासां यारां गंगा मैली कर रही है॥

मील की चमनी को धूंवों

धरती का धूंवां नै बन्दो टोक रियो हो टोक।

कै बैटा!

मूं बरखा नै रोक रियो हूं

थूं सासां नै रोक॥

यूं करतां—

ये चार तत्व तो निवड़ गिया है।

अर बढ़ती आबादी का मितरां

आगै भी अगर ये ही हाल रिया है॥

तो पांच तत्व में बच्यो थको

आकाश तत्व।

यो सरंग फाट जावैलो।

जींकै कोई थैकळी नहीं लगा पावैलो॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : ब्रजमोहन सपूत ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-17
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