सारै दिन चपड़-चपड़ करै

अै सकूलां की

छुट्टी के पड़ज्या

जाणै सारो वातावरण

बेमतलब की

पंचायती सूं भर ज्याय...

अर भाया कम बोल्या करो

जठै जरुरत रह्वै बठै ही

चूंच खोल्या करो

खामोस रहणो भी

एक कला है

ईं कला में हर कोई

पारंगत कोनी होवै

अर जे हर कोई ईं कला में

मंझज्या तो भाईड़ा

नींव का भाटा भी

बोलण लागज्या।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : बनवारीलाल अग्रवाल ‘स्नेही’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी ,
  • संस्करण : अंक-44
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