म्हैं घणी
कोसिस करी कै आ
कम्बख्त चिड़ी
म्हारै कमरै में घूंसलो नीं बणावै
वा तरै-तरै रा
तिणका चुग’र ल्यांवती
कदै पंखां री टोपी में
तो कदै किताबां रै लारै
घूसंळो बणावती
म्हैं बां तिणकां नै उठा’र
बारै फींक देवतो
बा बेचारी किंवाड़ माथै बैठी
चूं-चूं करती देखती
अर म्हनै उण रो घूंसळो
बिखेरण में मजो आंवतो
पण पछै दूजै दिन देखतो
बा किणी दूजै आळै में
या किणी तसवीर रै ओलै
फेरूं घूंसळो बणावण लागती
अर म्हैं फेरू फींक नाखतो,
म्हारै अर चिड़ी रै बीच
ओ सरबनास रो खेल
ठा नीं कद सूं चाल्यो आवै
पण म्हैं कांई उण नै मिटा पायो?
म्हनै लागे ओ आदू संघर्ष है
ईंया ई चालतो रैसी।