बरतीजै आखर ज्यूं कळस।

बांटीजै दवा ज्यूं परसाद।

पढ़ीजै मंत्र भाईचारै रो।

मांगीजै दुआ सांति अर अमन री।

लगाइजै परिकरमा जगत कल्याण री।

लागै भोग किणी भूखै नै।

बजाइजै संख नगाड़ा, मिटावण सारु भेद जात–पात रो।

खींचीजै तिलक-रेख इण भव रै कर्‌योड़ा करमा री।

फगत बणणो

चावूं म्हैं पुजारी

उण मिंदर रो।

स्रोत
  • पोथी : कवि रै हाथां चुणियोड़ी
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