समाजवाद रा बीज तो घणाई बोया

बेला ईं फूली

पण, फूल लाग्या कोनी

फल दरनाम हुया कोनी

किरसाणो रोतो रह्यो

रोवै

ओजूं देखां कंईं हूवै

सूरजड़ो अगूणो उग्यो

आथूणो आथग्यो

किरसाणो रूखाळतो थाकग्यो

कातरो मांयनै जड़ां खायग्यो

हरियाळी देख अेकर राजी हुयग्या

सुपना तो साचांणी हुया’क नीं

सुपनां रा रूंखड़ा तो सूखग्या।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : भाग्य रेखा ,
  • संपादक : दीनदयाल औझा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : फरवरी, अंक 12
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