सार

म्हारै रूं-रूं सूं निकळै

पळ छिण

अेक तिस उकळती-ऊफणती

जिण रै मांयनै कठैई

अणगिणत, अथाग

अणबुझी बासनावां री

छटपटाती, मरोड़ा देती पीड़

धाड़ मारती सी कूकै

मन करै, सिस्टी रो सगळो फूटरायो

कंवळाई, गीसई, जोबन

अंग-अंग में रम्योड़ो चुंबकी खिंचाव

म्हारी बाहां में समेट ल्यूं

म्हारै मांयनै उतार ल्यूं

दूजै किणी नै देखण नीं द्‌यूं

यो अेक ब्यान है इकबालिया

सौ टंच खरो,

झूठ-फरेब, ढोंग-पाखंड सूं परै

या अेक भूख है जन्म-जन्मांतर री

पुरख री प्रकृति रै खातर

चीज और भी है घणी फूटरी

जियां तारा छाई रात मधरी चांदणी

मुळकतो चांद

झीणी बायरी

गरजता बरसता बादळ

उमड़ती कळायणां

पळाका मारती बीजळ्यां

बरसतो आभो

झिरमिर-झिरमिर करता लोर

जळ सूं पूर नंदी-नाळा

हवोळा खाता सरवर

लीला कच्च झोळा खाता रूंख

महकती वणराय

छतरी ताण्या नाचता

टहूका दे-दे कूकता मोर

आभै में कतारबंद उड़ती कूंजा

हरियाळी सूं लड़ा लूंब डूंगर

अर पर सूं

कळ-कळ कर कूदता झरणा

कोसां लग फैली सोनल बेकळु

अै सगळी भी सोवणी-मोवणी है

पण इणां में है अेक हिमळास

अेक तरी, अेक सीतलता, अेक सांती

यां नै देखणो चाहूं

नैण तिरपत करणां चाहूं

हिवड़ै में यांरी ठंडक उतारणी चाहूं

म्हारै भांत दूजा भी इणां नैं देखो

सरोवर यां में रमा-कूदो

प्रकृति रा यां दोनूं रूपां मे इत्तो आंतरो

लपट अर फूंहार, लू अर बायरो

बळत अर सिळाई, मोह अर विरक्ति

फेर भी पंतगियो झळ कानी लपकै

दीयै री लौ बळणियैं नैं हैला सा मारै

इण झळ में कूदणौ

इण लो में जळ-जळ मर राखा हौणो

सार समझै।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : रावत सारस्वत ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 11
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