अेक दिन

गैंती, सब्बळ, फावड़ा-तगारी

कुदाली-कुल्हाड़ी, सगळा औजार मिलग्या

अर बातां करण लाग्या

बातां ही बातां में

आपणी-आपणी ढपली, आपणी-आपणी राग पे आग्या

गैंती बोली-मैं नुवां तीरथ धाम

कारखाना री सरूआत करूं

जिण पै निरमाण सूं नक्शो साकार हुवै

विकास रो आधार बणै

खुसहाली री रोसनी रो सनेसो घर-घर पूग जावै।

उण पल-बोल उठी सब्बळ

जद गैंती री चाल रुक जावै

तो सगळां नै सब्बळ याद आवै

मैं विकास री राह रा रोड़ा नै हटावूं हूं

काम री धीमी चाल नै तेज बणावूं हूं।

अणाचूक फावड़ो कैवण लाग्यो

ठीक है, ठीक है, तुम छोटी नहीं हो

परन्तु मैं भी तो बड़ा हूं

यदि तुम मटकियां हो तो मैं घड़ा हूं

जद गैंती अर सब्बळ ढेर लगावै है

तो उण ढेर नै फावड़ो इज हटावै है

नहरां रो पाणी धोरां-धोरां में पूगावै है।

जद आयी तगारी की बारी तो बोली

तगारी नै भी आपणी भूमिका पै नाज है

श्रम देवता रा हाथां रा गहणां हो सकै

गैंती अर सब्बळ

तो तगारी भी सिर रो ताज है

मैं रेती सिमेंट रै मिलण री साक्षी हूं

पत्थर नै भी आपणी मंजिल पै पूगावूं हूं

नींव सूं ले’र शिखर तक साथ निभावूं हूं

खेत तलक खाद ले जावूं

उपज म्हारा करतब रो परिणाम है।

हां तो कुल्हाड़ी? तुझे क्या कहना है

तू तो आपणा ही पगां नै जख्मी बणावै है

हरिया मरिया रूखां पै तलक चाल जावै है

निरमाण की उम्मीद करणो तो थारा सूं बेकार है

तू तो बस टुकड़ा-टुकड़ा करण नैं सदीव त्यार है

ठहर-ठहर म्हारी लाडली

तू तो म्हारा सूं लड़बा री ठाणी है

मत भूलजे तू देराणी तो मैं जेठाणी हूं

मैं टहनियां का उलझा सवालां ने सुळझाऊं हूं

सृष्टि पै शिव तत्व री याद दिलां संतुलन बणाऊं हूं

मूं नी चालूंगा तो मामलो बढ़ जायेगा

रूवालो गड़बड़ नजर आयेगा।

औजारां नै बात करता देख’र

गयो हथोड़ो और कैवण लाग्यो

सूत साबल करणी म्हारा साथी है

मैं सदीव मैंणत री खावूं हूं

श्रमेव जयते रा गीत गावूं हूं

इण खातर आप सगळा नैं अेक बात कहणो चावूं हूं

‘आप सगळा हो आदर जोग

पण मत पालो मैं मैं रोग

सगळा मिल’र चालोला

औजारां रो मान बधैला

खुसहाली निजरै आसी

मैंणत रंग ल्यासी।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : रमेश मयंक ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 15
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