धरती रै अेक खूणै सूं निकळती

अेक काळी चादर निजर आवै

बा दूजै खूणै तक छावै।

उणरै हेटै

कैई काळा दाग

छोटा-मोटा

घटता-बढ़ता

रंग बदळता, रूप बदळता जावै।

च्यारूं कानी

आभै सूं झरै

कै अमीं ईज इण काळस नै

आभै मांय बघावै

कीं समझ नीं आवै

पण काळस जमै

अर जमती जावै।

धीरै-धीरै गिटण लागै

समै इण काळस नै

अर उण ईज दिसा सूं

जिणसूं निकळी ही चादर काळी

दीखण लागै लाली

उणसूं करै सिनान धरती

अर काळस छंटतो जावै,

जांणै कोई आथूण दिसा सूं

चादर भेळी करती जावै।

स्रोत
  • पोथी : ओळमों ,
  • सिरजक : पारस अरोड़ा ,
  • संपादक : किशोर कल्पनाकांत ,
  • प्रकाशक : कल्पना लोक प्रकाशन रतनगढ़ (राज.) ,
  • संस्करण : सितम्बर
जुड़्योड़ा विसै