जद भी वे
उठै सूं बगै
रस्तै मांय ऊभौ पीपळ रौ बिरछ
(जकौ हवळै-हवळै सूक रेयौ है)
बांरौ रस्तौ रोक लेवै
अर मांगण लागै हेसाब
पत्तै-पत्तै रौ
जका उड्या है—
आंधी-तूफान अर बरसतै पाणी मांय...
वांरी निगैदास्ती में
जिणां रौ अजै ताई
की ठा नीं लाग्यौ है—
वै सरीफ हा
अर बदळतै मौसम रै सागै
समझौतौ नीं कर सक्या
इणरै सिवाय
वा रौ कोई दोष नीं है
वै बुदबुदावै
अेक नकली फेहरिस्त दिखावै
मांफी मांगण री मुद्रा मांय
वां रा हाथ
धनख बण जावै
वां री रीढ
डोरी तण जावै
कुचालां रा बाण
बण जावै आस्वासण
हवळै-हवळै अेक मंतर बांचै—
‘हरित कांति’!
‘हरित कांति’!!
बिरछ नै बूजणी छूटै
अर सगळी रीस ने ओळमा
अेक लपचेडू मुळक में बदळती
टांय-टांय फिस्स होय'नै
बिखर जावै
बस! इत्तौ होवतां ई
जनसेवक भळै निखर जावै...