जद म्हैं

आडा-अंवका घाटा उतरूं,

तो म्हनै अंधारै रो

डर लागै, घणो-घणो!

जद म्हैं

जंगळ-जंगळ रांफळ करूं

तो म्हनै, अंधारे रो

बी लागै, घणो-घणो!

जद म्हैं

किरणां री बात करूं

ओजास में हेला पाड़ूं

उण बखत

अंधारै रो डबको

अंतस में रळकतो रैवै,

घणो! घणो!!

अंधारै सूं डरां!

म्हैं चानणो चावूं

बारै भी,

मांय भी!

पण चानणो

कोई अेवड़ री गाडर तो कोनी

जद भी जी में आवै

ऊन उतारतो फिरूं!

चानणो,

दीयां में पण कठै?

बाती धुंओ सिरजै!

हेठै अंधारै रा टाबर पळै!

अंधारो

अवस प्याऊ रो नळ है

जठै बूख मांड

भर पेट पाणी पी सकां!

अंधारो

कठै भी मिळ सकै

जणा ईज तो डरूं!

बिस्तर छोडण सूं ले

बिस्तर पै पूगण तांई

चांनणै रै दिवा-सपनां में

कोरो अंधारो अंधारो तो दीखै!

दिन भर

लक्ष्य बिहूण थाबा खावतो

जद घरां आऊं,

अंधारो थड़कण माथै ऊभो

मुळकतो मिळै!

डरूं, थरथर कांपूं!

पण अंधारौ

दुलार सूं पुठी माथै हाथ फेरै,

सायरो देवै

बिस्तर तांई पुगावै!

अब म्हैं

अंधारै सूं कोनी डरूं,

अंधारो मन्नै

राखस नीं लागै–

मोटै मोटै डेना वाळो

बिकराळ! राखस!!

म्हैं सोचूं–

अंधारो सिराणै बैठो है

चांनणो कठै?

उण सूं प्रीत केहड़ी?

म्हारै कांईं काम रो च्यांनणो?

लोमड़ी लायण पेलां ही कूकी ही

पण म्हैं बिसवास कद कर्‌यो

मीठास कठै अंगूरां में

खाटा अंगूरां सूं बेसुवादिया खोखा चोखा

म्हारो मन,

अंधारै में रमतो जावै!

अर जद म्हैं

म्हारी दिन भर री कमाई सूं

कमरै रै तन-मन रो रीतोपण

जोड़ूं, तो अंधारो फट सूं

म्हांरी आंख्यां मींच देवै

पलकां हाथ फिरावै,

माथो पंपोळै,

मुंडै लाड करै!

अंधारो म्हारो बेली

म्हारै खनै है!

अबै कमरै री सैं बसतां–

खूंटी टंग्यौ लीर-लीर कोठ,

चुटकणै बारो कप,

तेड़ खाई प्लेट-तासकां,

केई बघार वाळी चप्पल

काट खाया खाली पीपा,

खांडी मटकी अर धुबियो लोटो

थैलो, कागद, भाठा, कचरौ,

म्हारै पूठां माथै

आक्रोस रा इंजेक्शन नीं लगावै

लोही रो आधण नीं बणावै!

अंधारो रात भर

म्हारी रिच्छा करै!

पण भाख फूटतांई

अंधारै री सगळी

किलाबंदी-नाकाबंदी रै बावजूद

ठा नीं कठै सूं आय

अेक फूठरी चिड़ी

म्हारै बिस्तर माथै

होळैसीक नांख देवै

किरण रो अेक तिणको

म्हारै पिंड सूं चेंट जावै

तो म्हारी अबूझ

अंधारै संग नाठ जावै!

उण बखत म्हंनै

चांनणै री हर आवै,

किरणा री ललक जगै,

अर अंधारै सूं

डर लागै, घणो-घणो

म्हैं मैसूस करूं

अंतस में रळकतो अेक डबको!

कमरै री बसतां नीं चूकै–

पूठां में इंजेक्शन जड़ देवै,

अर म्हैं

टूटी चप्पल पैर

चांनणै री सोध में बईर हुय जाऊं–

अनन्त जातरा पर!

म्हैं अेकर फेर

लोमड़ी री बात माथै

माथौ धूंण अबिसवास करूं!

हरियल बिरछ रा अंगूर

खाटा किंयां हुय सकै!

अंधारो

अेक मीठौ ठग है,

दिन भर री कमाई

रात में ठग लेवै!

अंधारै सूं म्हनै

बी लागै, घणो-घणो!

अंधारो,

रळकतौ अेक डबको

अंतस में! घणो-घणो!

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : पुरुषोत्तम छंगाणी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 15
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