जद-जद भी धरूं छूं

गुलाब की कलम पै

खरदरी हथेळी तो कलम

हथेळी सूं बात करै छै।

जद-जद भी धरूं छूं

गुलाब का पानड़ां पै

हथैळी सूं चपक ज्या छै।

जद-जद भी धरूं छूं

गुलाब की कळी पै हथेळी

तो

कळी को गुलाबी बदन

हो जावै छै रातो छट्ट

जस्यांन

कोई नै हळकी-सी’क

थाप लगा दी होवै

बाळक का गुलाबी गाल पै।

जद-जद भी गुलाब का पसब पै

धरूं छूं हथेळी

तो अेक-अेक हो’र

पांखड़्यां पड़बा लागै छै जमीन पै,

जीं सूं

धरती की कोमल काया पै

पांखड़ी खरबा सूं

न्हं लागै झाटकौ।

जद-जद भी सोचूं छूं

गुलाब का कांटा पै

धरबा की ‘हथेळी’

तो मन में

झन-झन्नाटो-सो’क होवै छै

पसीनो जावै छै करमटा पै।

मनख भी गुलाब छै।

मनख कै भी होवै छै

कलम, डाळ, पानड़ा,

पसब, कळ्यां अर कांटा।

जद-जद भी सोचूं छूं

मन सूं मलबा की बात

तो आपू आप हथेळी

जावै छै मूंडा कै आगै।

हथेळी की बात मानूं?

कै,

मनख की बात मानूं?

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : प्रेमजी ‘प्रेम’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 14
जुड़्योड़ा विसै