किण नै नमन करूं

मैं नीं जाणू

पण, जाणू भी नीं हूं

कै, किण नै नमन नीं करूं म्हैं।

म्हैं सोचूं हूं

माटी रै रज कण स्यूं आभा ताणी

सो क्यूं म्हनै

लागै है पूजा जोग,

इण खातर मां

म्हैं तनै ध्यावूं हूं

पूजा करूं हूं थारी

थारली अण-गिणत झुर्‌रियां में म्हनै

तेतीस-करोड़ देयी-देवता

लुक्योड़ा दीखै है।

म्हैं जद भी झांकू हूं थारी आंख्यां में

फगत लखावै उण में म्हनै म्हारी चिंता री सुलगन

मिन्दर री अगरबत्ती सी,

मज्झ आधी रात में भी

तू जागती रैवै है

अखंड जोत रै दीवलै ज्यूं,

इब तूं ही बता माँ

म्हैं किण नै पूजूं

अर किण नै नमन करूं?

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : राधेश्याम 'अटल' ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 26
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