ज्ञानी कू परख चलती आई बात पुराणी की
राऽजाऽऽ री राणी काग उडाणी की।
बणिया कू परख होवै जैसे लाभ-हानि की
स्वाभिमानी कू परख होवै मानहानि की
कवि कू परख होवै आंखिन का पाणी की
माथा कू धोबाळी कू है माटी मुलताणी की।
कुंआ पै मोटर चालै
ओ जीजी आजा तू भी न्हालै
ज्ञानी कू परख चलती आई बात पुराणी की
राऽजाऽऽ की राणी काग उडाणी की।
परख पाड़ौसण कू होय दौराणी-जिठाणी की
मांग खाबाळा कू होय परख धिराणी की
हाळी कू परख होय घर मं तूड़ा-पाणी की
मइया कू परख होय वाकी बेटी स्याणी की
भाई जबी गिरस्ती चालै
तू जचै जेइपै परखालै
ज्ञानी कू परख चलती आई बात पुराणी की
राऽजाऽऽ की राणी काग उडाणी की।
रेत के निवासी कू परख जैसे पाणी की
भूखा कू परख होय भूँभड़ा र धाणी की
रात के बटोही कू परख जैसे ढाणी की
दुखिया कू परख जिंदगी की धूमधाणी की
पेड़ पौन सूं हालै
तू जचै जेइपै परखाळै
ज्ञानी कू परख चलती आई बात पुराणी की
राऽजाऽऽ की राणी काग उडाणी की।