पाणी!
लाय लगाय गयो पाणी!
सुखाय ग्यो नैण,
बिछड़ाय ग्यो सैंण,
गुमवाय गयो बैंण।
पाणी!
ढायां गयो जीवण री लैंण।
गांव, गोठ, गुवाड़ी,
ढोर, धराव, ढ़ांणी,
लील गयो सब,
कठै सूं आयो?
खाय गयो पाणी!
हरिया-हरिया रूंख,
खेतां ऊभा पूंख,
पिरभाती पांण जागतौ भोर
पिणघट पिणहार्यां रो सौर।
घरटियां रा घर्रणाटा,
ऊंटां रा अरड़ाटा,
रम्भावती गायां री गोर,
देखतां ई देखतां परी गुमाई।
खेतां में पसरगी वेकळू,
खळा व्है गया खळू-वळू,
आभै सूं उतरियो काळ,
ऊणो-खूणो लियो खंगाळ।
भरिया भरिया घर,
होय गया बेघर,
पसरियो है सून्याड़,
चमन हुया उजाड़।
किणनै कैवां,
कांई कैवां?
इन्दर तो तूठ्यो अणमाप,
पण,
राम भी रूंठ्यो हदभांत!
काळ री डाढ़,
खाय गी गाढ़,
गाळ दिया मरमट,
कस-बळ दिया काढ़।
पाणी चढ़ग्यो परवांण,
इण धर रा मनसोबा,
बाढ़ गई बाढ़।