अेक गादड़ो अर ऊँट,

दोनां में चोखी यारी।

रैवै साथ जंगळ में,

सारा चरचा करै उणां री।

गादड़ कैयो अेक दिन

भाया! थांनै बात बताऊँ

मन में अगर जचै थां रै,

खरबूजा खूब खुवाऊँ।

बात सुणी खरबूजां री

मूंडै में पाणी आयौ।

बोल्यो ऊँट, ‘अरै भाया!

क्यूं पैल्यां नईं बतायौ?’

‘म्हनै आज सवारै ई’

लूंकां बात बताई।

इतरा मीठा है, कुदरत

ज्यूं बां’में खांड रळाई।

पार जावणो हुवै, बिचाळै

पड़ै नदी ‘काळी’।

लाठी लियां खेत रो मालक,

रात्यूं करै रुखाळी।’

बोल्यो ऊँट, ‘फेर तो भाया,

नईं चालणो चोखो।

चोरी करतां पकड़ लिया

तो, डंड भुगतणो ओखौ।’

‘खेत रुखाळो सो ज्यासी

जद, दब्यै पगां चालांगा।’

गादड़ बोल्यो, ‘धाप-धाप नै,

खरबूजा खा ल्यांगा।

सूत्यां पछै करसै नै

बोलो के बेरो लागै?

आपां पाछा जास्यां

जद तांई करसो जागै।’

बातां सुणी गादड़ै री अर

ऊँट रै लाळच आयो।

जनम अकारथ जावैलो,

जे नईं खरबूजो खायो।

बिठा पीठ पर गादड़ नै

जद आयो ऊँट खेत में।

सोवणा मीठा खरबूजा,

देख्या बाळू रेत में।

सूतो देख रुखाळो दोन्यूं,

खावै हा तावळ कर।

खेत रो मालक नईं जागज्यै

बां नै लागै हो डर।

पाँच-सात खावतां ई,

गादड़ रो भरग्यो पेट।

मस्त हुयो गादड़ बाळू पर,

खूब लगावै लेट।

बोल्यो, ‘भाया ऊँट म्हनै

तो, अब ‘हुतहुती’ आवै।

गास्यूं मुधरो गीत अेक

बो, सगळां रै मन भावै।’

‘अरै भायला..! होळै बोल

कीं, जासी जाग रुखाळो।

कूटैलो जचा’र दोनां नै,

कोनी करसी टाळो।’

मान्यो नीं गादड़ो, कर

मूं’डो ऊँचो, छेड़ी राग।

सुण अचाणचक्क कूक

नींद में, गयो रुखाळो जाग।

लाठी ले जद कूटण लाग्यो,

ऊँट घणो अरड़ायौ।

कूट-कूट खेत रै मालक,

ऊँट रो डील सुजायौ।

ज्यान बचा ऊँट भाज्यो

अर आयो नदी रै छेड़ै।

पैली सूं लुक बैठ्यो गादड़,

आयो उण रै नैड़ै।

कीं नीं बोल्यो ऊँट प्रेम सूं

उण नै पीठ बिठायो।

होळै-होळै चाल फेर बो,

बीच नदी रै आयो।

बोल्यो, ‘भाया गादड़!

म्हनै अब ‘लिटलिटी’ आवै।

ठंड़ो-ठंड़ो पाणी म्हारै

तन नै घणो सुहावै।

गादड़ चिरळी रैयो मारतो

ऊँट लिट्यो पाणी में।

आप समझग्या इण सूं आगै

कांई हुयौ कहाणी मे?

बात सदां सांच रैवेली

कथग्या पंडत जोसी।

मीत बणै अर धोखो देवै

बां री गत होसी।

स्रोत
  • पोथी : कुदरत रो न्याव ,
  • सिरजक : मंगत बादल ,
  • प्रकाशक : बोधी प्रकाशन, जयपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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