थे तो कवि हो

मानीता कवि

म्हे नुवा-नादिता

कांई जाणां कविता सार

नीं तो म्हे दाड़ी बधाई

अर ना ही कवि-सम्मेलणां में जावां

कवियां सा लखण ही नीं है म्हारा

म्हांनै कठै ज्ञान छन्द-फन्द रो?

थारै दांई कविता नै

सोनै री मोहर ज्यूं

नीं बरतां म्हे

फगत छपास रा रोगी हां

थे तो समरथ हो

कविता लिखणो

डावै हाथ रो खेल है थारै खातर

पण म्हे?

म्हारी तो मजबूरी है

आपौ-आप सूं मजबूर हां म्हे

म्हांनै तो मर-पड़’र ही लिखणी पड़ै ओळ्यां

ज्यांनै म्हे कविता केह देवां!

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : मदन गोपाल लढ़ा ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-17
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