अे मायड़ भोम री मातबर माटी

म्हैं थनै जद ओढ’र सूवूं

फातिहां री लोरी बिना

म्हनै आयजा गाढी नींद...

जद थनै नीं पैरूं

तद आखी उमर

नागौ दीखूं

पण वै सगळा तो अजेज

चौमासा रा बाळ्हा ज्यूं

उतावळा बैय-बैय’र निकळग्या

अपां अबै दोय न्यारा-न्यारा!

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : चन्द्रप्रकाश देवळ ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : जून 1987
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