मरु भूमि का गीत मनोहर, हरषा राखै मन्न
बड़ा मधुर रमणीक रसीला, आं में है लावण्य
तीज पीपली कुरजा ओळ्यूं, जल्ला मारू घूमर
‘बिणजारो’ झुमको पणिहारी, लूर मांड व मूमल
ऊंट चढ्यो पातळियो ढ़ोलो, मारू मन की थाती
मन का भाव मिलै गीतां में, वाह भई शेखावाटी।
आम आंगणै नीम पिछोकड़, मरुओ खुशबूदार
दिलकस भाव बड़ा गीतां में, भरी पड़ी मनुहार
नोखीला बादीला रसिया, रंगीला’र गुमानी
कतरा मीठा सम्बोधन, कितनों शब्दां में पाणी
कण्ठ सुरां में काव्य कल्पना, मधुर भाव दर्शाती
कानां सै पड़ ज्याय दिखाई, वाह भई शेखावाटी।
मोती समदरियै में निपजै, गौरी कै मन पीड़ा
कदली देश का हाथी चहिये, सिंधु देश का घोड़ा
छैल भंवर को कांगसियो, राई धण को उमराव
गीत बड़ी अनमोल धरोहर, आमें है उमड़ाव
ओळ्यूंड़ी छूज्याय काळजो, सुण भर आवै छाती
सुबकादे सबनै यो ओसर, वाह भई शेखावाटी।
छैल भंवर सा पिवै तमाखू, रस को लुब्धी भंवरो
सदा सुरंगी चिरमी, मोहै सुहागण को चुड़लो
रातां में छातां पर बिखरै, मधुर राग औ रंगत
पिकबदन्यां का गळा सुहाणा, बड़ी सुहाणी संगत
काजळ बड़ो कुचरणी गारो, धण अंखियां शर्माती
गीतां पर चढ़ उड़ै कल्पना, वाह भई शेखावाटी।