मिनख मिनख रै लारै जनमी, जग में सहस उसांस है
आज आदमी भरी भीड़ में, मुड़दाघर री लाश है
झुलस गई आखी अमराई, इतरा अंगारा उगग्या
आदमखोरां री बस्ती में, मोत्यां नै कागा चुगग्या
फण फैलायां सूनै घर में, बैठौ अविश्वास है
आज आदमी भरी भीड़ में, मुड़दाघर री लाश है
पग रौ कांटौ हाथ न काढै, साझीदारी टूट गई
आंख आंगळी रा घोबा सूं, काजळ देतां फूट गई
घोड़ी चढग्या थोर, खेजड़ा कुचल्या पड़्या पलास है
आज आदमी भरी भीड़ में, मुड़दाघर री लाश है
ऊभौ लियां पुलाव प्लेट में, इमरत-सी मीठी बाणी
हर चंदा नै बेरौ जाणै, टिप री बणगी जिंदगाणी
चूर-चूर व्हेग्यौ छिटक कै, व्हिस्की भर्यौ गिलास है
आज आदमी भरी भीड़ में, मुड़दाघर री लाश है
आंख मींचणी मेल रह्या सै, पण मन भेंट नहीं पाया
आस हुई भर जोबन विधवा, गीत बधावा रा गाया
बिना रंग रौ नक्सौ दीसै, मायड़ इयां उदास है
आज आदमी भरी भीड़ में, मुड़दाघर री लाश है।