महताऊ नीं हो म्हारो सुपनौ

पण अणमहताऊ

चीजां रौ टूटणौ भी

घणौ महताऊ हुया करै है

बात आंख नै

सुपनां टूट्यां पछै लखावै।

म्हारो सुपनौ हो

जंगल रो अेक रूंख

आपूं आप

कांकरां-भाठां सूं

बिना मोहरत उग्यौ

नीं कोई उण री जड़ां मांय

कंवळी गार नाखी

नीं कोई उणनै सींच्यौ

चांदी-सोनै री झारी सूं।

सुपनां नै यां

सगळी चीजां री

दरकार नीं हुयां करै है

सुपनौ तो आंख्यां देख्यां करै

जे सुविधावां नै सुपनां दीखता व्हैता तौ

मोटी-मोटी हवेलियां, कोठ्यां

अर बंगलां रै असवाड़ै-पसवाड़ै

सुपनां सुपना उग जावता

घास-फूस रै उनवांन।

म्हारो सुपनौ

जकौ अेक रूंख हो

अेकाअेक व्है ग्यौ जोध-जवान

उण माथै सौरम सूं सराबोर

कळियां बकाबक हंसती

रोळ-ठोळ करती लखावती अस्टपौर

भांत-भांत रा पंछी

रात-बासा सारूं आवता

इण री घेर-घुमेर डाळियां माथै

दिनूगै उड़ जावता गिगन रै ओर-छोर

रूंख आखै अणमणै दिन

चितारतौ रेवतौ पंछ्यां नै

निरखतौ रेवतौ

फूल बणती कळियां नै

थुथकारौ नाखतौ

सुघड़ फळ बणता फूलां नै देख’र

फेर संझ्या आवती

रूंख रा नैण

देखण ढूकता

अेक और नुवौ-नकोर सुपनौ।

कांई देखतो हो

म्हैं सुपनां मांय?

वो महताऊ नीं हो—

किणरौ सुपनौ देखतौ व्हैला रूंख?

वो पण महताऊ नीं हो—

महताऊ हो के

म्हैं सुपनौ देखतो हो रूंख रो

अण रूंख कदास

सुपनै मांय म्हनै देखतो व्हेला।

महताऊ यो भी हो के

रूंख अर म्हैं

दोन्यूं अेक ईज

सुपनौ देखता हा

हरियाळी अर सौरम रो सुपनौ

कळियां री बकाबक हंसी

अर झकाझक फूलां रो सुपनौ

अर सबसूं महताऊ हो के

म्हैं दोन्यूं जाणता हा कै

सगळा सुपना

अेक’र अेक दिन

टूट जायां करै है।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : भगवतीलाल व्यास ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक–18
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