कुण जाणै कद चढ़ी ताप, कुण जाणै कणां उतरगी।
म्हारी आ लापरवाही म्हांनै तो ठंडा करगी॥
कितनी बाणं कुबाणं लियां
जीर्या हां नकटा हो कै।
झूठो सुख आंटी में बांध्यो
गांठी को सो खो'कै।
कोई राजी बोल दियो तो समझो नीत फिंगरगी।
म्हारी आ लापरवाही म्हांनै तो ठंडा करगी॥
जणौ-जणौ संगी होतो
पण जणै-जणै सूं खो ली
कूणै खड़ी कुबाण देख कै
सागौ सागै हो ली।
थोथी सार संभाळ, स्यान चौरस्तै बीच पसरगी।
म्हारी आ लापरवाही म्हांनै तो ठंडा करगी॥
नितकी देर करी जागण में
आळस नै घर नूंत्यो।
सो जनमां को जाप जमारो
बिना भाव ही कूंत्यो।
सुत्या रैया गांव री गायां खेत समूळौ चरगी।
म्हारी आ लापरवाही म्हांनै तो ठंडा करगी॥
कड़की का दिन कट्या मौज में
सुख आयां, दुख पाया।
भूखा रैया जणा तक लोगां
गीत मौकळा गाया।
आ ही रैयी अकूंत कमाई म्हारै जीवण भर की।
म्हारी आ लापरवाही म्हांनै तो ठंडा करगी॥