म्हैं सोच्यो हो–

पढ़-लिख’र म्हारो बेटो रामूड़ो

मिनख बणी, राम बणी

पण वो पढ़-लिख’र

राम तो बण ग्यो

पण मिनख कोनी बण्यो…

आळै दर्जे रो अफसर कांई बण ग्यो

म्हारै सूं अर गांव सूं अळगो व्है ग्यो।

हर महिनै डाकियो अेम.ओ. लावतो रैह्यो

पाड़ोसियां सूं हंस-हंस नै दिन कटता रह्या

कदी-बेटो गांव आवतो

तो पैली आ'ईज बात पूछतो

कै थनै अेम.ओ. मिल्यो. मां?

जाणै… अेम.ओ. म्हारो बेटो व्है!

अर घण्टा-बे घण्टा ठैर्‌यो नीं ठैर्‌यो,

गाडी पकड़’र पाछौ बीनणी कनै शहर में,

कैव' नै जावतो परो कै–

'टाबर घरै अेकला है'

हां रै बेटा, हां…

टाबर तो अेकला'ईज आया

अर अेकळा'ईज जावैला,

थूं करसी उणां रो?

म्हैं कांई कर्‌यो थांरो!

अर थैं कांई कर्‌यो म्हारो।

बस, ओ'ईज कै थैं

म्हारो मोल अेम. ओ. सूं कर्‌यो…

बस ओईज कै म्हनै पइसा री जरुरत है,

बेटा री जरुरत नीं है…

पण बेटा साची बात तो है

कै थूं म्हानै अेम.ओ. मत मेलजै

बस बठै है, कैवजै–

'म्हारी मां अजै है!'

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : मीठालाल खत्री ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन, पिलानी ,
  • संस्करण : अंक-19
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