आखै दिन री

गिंगरथ

अर मन री कथ नै

रात रै अंधारै मांय

बोऊं सुपनां

अर जोऊं

सुपनां मांय

गांव गिंगरथ री

मांदी-धुंधळी बातां।

सुपनो-सुपनो हुवै

सांच रै आंच नीं

लगा सकै सुपनो

नींद, सुपनो अर चेतो

तीनूं न्यारा-न्यारा चितराम है

जिंदगाणी रै दीठाव रा।

नींद मांय

बीझोक पालतै सुपनै सूं

डाफा-चूक हुयोडा

मिनख चिंतन करै

सुपनो-सुपनो हुवै

चायै बो सुख रो हुवै

अर चायै हुवै बो

माड़ौ-साव माड़ौ।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो पत्रिका ,
  • सिरजक : श्याम महर्षि ,
  • संपादक : नागराज शर्मा
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