अजकाळै रा

मोट्यार

हरमेस

पकड़ाए राखै

आपरी कळाई

नाड़ी वैद रे हाथां।

म्हारै जमानै मांय

ईयां नीं हो

जबरा दिलेर होवता

म्हे

जद जवान होंवता।

बतावै पिताजी

दमैरी खंखार नै

गळै मांय गिट’र

बड़ी माता रै पाण

खुट्योड़ी आंखां सूं

टळकते पाणी नै पूछ

गोडां माथै

हाथ राख

खड्या होंवता।

स्रोत
  • पोथी : जागती जोत ,
  • सिरजक : ओम पुरोहित कागद ,
  • संपादक : डॉ. भगवतीलाल व्यास ,
  • प्रकाशक : राजस्थान साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर
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