अेक

घर सूं निसर’र
घर-घर घूमणौ
तो अळगो—
जणा नारी
आपरै घाबां सूं बारै नीं काढ़
सकै ही हाथ
पग रै अंगूठै रो नख तकात
उण बखत त्यागा थे महल अटारी
नारी मुगती आंदोलन री
पैली जोत जगाई
थे तूठ्या दुनियां नै
थांनै तूट्यौ कन्हाई।

दो

मीरां री अेक मूरत सजाई
म्हैं म्हारै शौ-केस मांय
म्हूं मीरां नै देख’र
घणी हरखावती
याद आवती
कान्ह अनै मीरां री प्रीत।
इकतारो झाल्यां हाथ
दीसती बा म्हनै मीरां,

अेक जोगण-रूप।
आज जणा छोरी सजादी उण नै
अेक नूंवै ई ‘मैकप’
काट परी बाळ।
परै नाख दिन्यां
हाथ रा इकतारा अनै खड़ताळ।
अब बा म्हनै मीरां नईं दीसै
दीसै बस अेक लुगाई।
स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : सन्तोष माया मोहन ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक–18
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