मन

कीं कीं

करतो रैवै।

मन करै

पाखंडी बणूं

कळी बणूं

फळ बणूं

या

बा डांडी बणूं

जकी माथै लागै

पांखड़ी

कळी

फूल

फळ।

अर फेर करै

बणूं भंवरो

सुंघू फूल

बेअंत

कदै करै

बणूं रुत

फगत बसंत।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : ओम पुरोहित ‘कागद’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-31
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