ढकियोड़ै कमरै मांय

च्यानणो बारलो

आवै किंयां।

बांधीज्योड़ी

दीठ म्हारी

अंधारै तकात।

बारलै सोवणापै सूं

तिसळतां-तिसळतां

नव्यां नैण म्हारला

अड़ नीं पावै

मांयलै उंडैपण रै

फळा री अणोपम कीरत

रूकीज्योड़ी है

काठ हाळै चौखटै मांय

दासता सूं

मिनख रै मुगट रो

सुण रैयी, दाकळां

पण!

हाथ म्हारला

बंधीज्योड़ा

चाल थमियोड़ी

अर

जाणै कद

भौ री तरवार

तूट पड़ै, म्हारै ऊपर

सिलगती चिता रै कनै

लाग रैया है कहकहा।

स्रोत
  • पोथी : ओळमों ,
  • सिरजक : रतनलाल जोशी ,
  • प्रकाशक : कल्पना लोक प्रकाशन रतनगढ़ (राज.) ,
  • संस्करण : सितम्बर
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