बस्ती-बस्ती जंगळ बैठ्या—

कुण नै व्यथा कैवां।

म्हैल हुया मिमिता रा खंडहर

प्यार गयो परदेस।

अपणूपण अस्तित्वहीन,

है असरहीन उपदेस।

आंगण में अेक सर्पिल बैठ्या—

कुण नै व्यथा कैवां।

पिता-पुत्र रो नातो

जियां मरणासन्न बिमार।

भाई-भैण नै बांध पावै

अब राखी रा तार।

रिश्ता बण पग-पग छळ बैठ्या—

कुण नै व्यथा कैवां।

हर मिलबा-जुलबा रो केवल

स्वारथ है आधार।

दोस्त-दोस्त रै बीच खिंची है—

साजिस री दीवार।

सब तन-मन सूं घायल बैठ्या—

कुण नै व्यथा कैवां।

होळी में बी मन रो कीचड़

नहीं उळीचै लोग।

नुवां फरेबां सडयंत्रा रा

बिरवा सींचै लोग।

सभी द्वेष रै दल-दल बैठ्या—

कुण नै व्यथा कैवां।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कुन्दनसिंह सजल ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक–18
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