उरबाणां पगां

खंवा माथै फाट्योड़ौ

झोळौ लियां

धूळ भरी डांडी पर

सुदामा चालतौ रह्यौ

आंख्यां में पुराणी मित्रता रौ

जोस अर उजास लियां।

इणां दिनां सुदामा रै घर मांय

ऊंदरां रै इग्यारसां व्हैती

भूख काठौ तंबू ताण्यां बैठी ही

केई दिनां सूं चूल्हौ नीं जळ्यौ।

लुगाई कैयौ—

''जाओ कनी,

थांरौ सांवरियो, थांरौ मित्र

द्वारका रौ राजा है।’'

सुदामा होळै’क हंस्यौ

अर अेक मुट्ठी चावळ

पोटली मांय बांध’र

चाल तौ पड़्यौ

पण धरती जितरी लांबी पीड़

रस्तै भर याद आई

पीपळ री छींया,

सांझ री वेळा अर

बंसी री धुन

जद-जद

भूख लागती दोनूं

आधी-आधी खाता हा।

छेवट द्वारका आई

म्हैलां रा सोना रा कांगरा चमक्या,

पण सुदामा री आंख्यां में अजै

गुरुकुल रौ आंगण बस्यौ हौ।

कृष्ण दौड़ता आया,

राजसी पाग उतर’र नीची पड़गी।

मित्र नै

बाथां में भर लियौ।

उण छिन द्वारका रा नाथ नीं रोया

लारै छुट्योड़ौ बाळपणौ रोयौ

बाळपणै रौ समै रोयौ।

कृष्ण पोटली खोल’र

सूखा चावळ खावै

सुदामा लजावै-

''औ तो गरीब घर रौ अन्न है।''

कृष्ण मुळक्या—

‘'मित्र,

प्रेम सूं बडौ कोई

राजभोग कोनी।''

रैण ढळी

सुदामा मित्रता री दौलत लियां

पाछौ फिर्‌यौ,

घरै पूग्यौ—

झोंपड़ौ म्हैल बणग्यौ,

सुदामा री आंख्यां मांय

धन सूं वत्ती मित्रता री चमक ही

आज धरती माथै

जद कोई गरीब

प्रेम री पोटळी लेय'र

द्वार खटखटावै

कृष्ण जेड़ौ मित्र दौड़तौ आवै!

स्रोत
  • पोथी : कऊ री झाळ ,
  • सिरजक : प्रमिला शंकर ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रंथागार ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
जुड़्योड़ा विसै