बोल स्याणी बोल, आपां कियां मनास्यां दीवाळी।
घर में च्याऊं-म्याऊं लागी, मिनखमार महंगाई खागी।
पूण पावलो पल्लै कोनी, बेरूजगारी बेजां छागी॥
जनसंख्या को अड़्यो आंकड़ो, इब आपां दोन्यूं नीं रया ठाली।
बोल स्याणी बोल आपां कियां मनास्यां दीवाळी॥
खोटोड़ा घी को टीको कर, चावळ सा चीणी दाणां चेपांला।
पांच पतासा दो सिंठेळी मेल’र, भोग सवायो धर द्यांला॥
तेल रायड़ा, छोटी बाती आरती सूं, लिछमी राजी हो तो हो जाली।
बोल स्याणी बोल आपां कियां मनास्यां दीवाळी॥
पोळ्यां में भुवाजी बोलै, लड़ै ऊंदरा पेट में।
तूं बगनी होयोड़ी फिर री, जाणै आगी फेट में॥
जापा को खरचो कुण देसी, कियां बाजैली अै थाळी।
बोल स्याणी बोल आपां कियां मनास्यां दीवाळी॥
गाभां कै कार्यां दे धोले, माथो धोले मेट स्यूं।
थांरी खोटी आदत, माथो खावण की है ठेठ स्यूं॥
पाव गुड़ का गुलगुला बणाजे, राम-राम नैं आसी साळी।
बोल स्याणी बोल आपां कियां मनास्यां दीवाळी॥
कांचळी, कब्जो, रिपियो दे, बीं नै भीर बेगी करजे।
घर की आछी भूंडी रामायण, बीं आगै तूं मत धरजे॥
अबकै तो धाको धिकालै, आंवती साल नीं जावै खाली।
बोल स्याणी बोल आपां कियां मनास्यां दीवाळी॥
नान्यां नै नानी कै भेजो, कमली काकी कै जासी।
नितकी चिकचिक मिटसी गैली, दो चार बरस रै पढ़ आसी॥
काळ दिवाळा टोटां री बाळद, बेगी ही लद जाली।
बोल स्याणी बोल आपां कियां मनास्यां दीवाळी॥
काळी को विकराळ रूप तज, सुरसत गणेस सुर मन धरजे।
हुयां जमानो और कमाई, सोळा सिंणगारां सजजे॥
सागण लिछमी घर घूमर घाल्यां, पगां नेवर्यां बाज जायली।
बोल स्याणी बोल आपां कियां मनास्यां दीवाळी॥