कींनै फुरसत! कुण करै बात
मिनखां री दबगी मर्द जात।
दिन ढळ जावै क्यूं आवै रात?
राता रळियो फेरूं प्रभात।
तूं-में, मैं-ओ, ओ-बो
जो जो कठै गयो बो।
लदग्यो, भारी बदग्यो
लिचपिच टांगा अर पड़ै लात।
चरलै, भरलै, झरलै,
कुण सी होवै परलै?
मीठो बणकै, तणकै
दो होठ हिला, कर सरू बात।
तेरो-मेरो चै’रो
ओ भेद बड़ो गै’रो।
थोथी लप-लप जप-तप
भगवान रीझ भी करै घात।