म्हैं मानतो हो

कविता हथियार कोनी

पण उण दिन

जद वे राता-पीळा होयग्या

और

म्हारी कविता नै करवा लाग्या लोहीझार

तो म्हैं समझयो

कविता हथियार को भी काम कर सकै है

उणा रो मानणो हो—

कविता रो अरथ है

जणमाणस रो मन बैलावै

हितोपदेश देवै

मीठा मसालादार पान रो सुवाद...

म्हनै हँसी आवै उणां री समझ पे

लोग कितरा भोळा है

आल तलक चिपर्‌या है

जूंनी मुरदा रीतां रै

जो आज रै नूवै बगत में

चिन्दी-चिन्दी होयगी

उणा री समझ सूं

कविता रा गणित सूं अळगो है

पिछड़्यां थका मिनख नै

उण रे लारे होवता, अन्याय रो अहसास कराणो

दाज्यां पे मरहम लगावणो

शोषित ने

संघर्ष सारू तैयार करणो

और

देस रा जण-गण नै

उण रा अधिकारां सांरू सावचेत करणो

जद सूं

उणां रे वास्ते कविता में

आम-आदमी रा दुःख दरद री

विगत मांडणो बरजित होयग्यो

म्हैं आपरी कविता नै

हथियार बणा लीदो है

श्रीमान जी!

आप मानो मत मानो

कविता हथियार भी है।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कमर मेवाड़ी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-17
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