सुख को कनको उडतो किंया, काण राख दी काणै में।

खोयो ऊंट घड़ै में ढूंढै, कसर नहीं है स्याणै में॥

भूल-चूक सब लेणी-देणी,

ठग विद्या व्यापार कर्‌यो।

एक काठ की हांडी पर ही,

दळियो सौ बर त्यार कर्‌यो।

बस पड़तां तो एक छोड्यो च्यारू मेर सिवाणै में।

खोयो ऊंट घड़ै में ढूंढै, कसर नहीं है स्याणै में॥

डाकण बेटा दे या लेवै,

भी बात बताणी के?

तेल बड़ां सूं पैली पीज्या,

बां की कथा कहाणी के।

भोळा पंडित के ले ले भागोत बांच कर थाणै में।

खोयो ऊंट घड़ै में ढूंढै कसर नहीं है स्याणै में॥

जका चालता बेटा बांटै,

बै नितकी प्रसिद्ध रैया।

बिगड़ी तो बस चेली बिगड़ी,

संत सिद्ध का सिद्ध रैया।

भी सिद्ध रैया तो कुण सो कटग्यो नाक ठिकाणै में।

खोयो ऊंट घड़ै में ढूंढै कसर नहीं है स्याणै में॥

बड़ै चाव सूं नाम निकाळ्यो,

होगो घर हाळा भागी।

लगा नाम कै ब‌ट्टो खुद कै,

लखणा बणर्‌यो निरभागी।

तूं उखड़ण सूं नहीं आप थकग्यो गांव जमाणै में।

खोयो ऊंट घड़ै में ढूंढै कसर नहीं है स्याणै में॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : भागीरथसिंह भाग्य ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-17
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