गाडां में भर-भर अमूंझता सुपना

बणावै अदीठ हवेल्यां

फाटोड़ी अंगरखी रै पांण

छाती तांण करतौ रै जेठ री लूवां सूं बाथेड़ौ

मूळ सूं डाळ पावण री लगायोड़ौ आस

बारूंमास!

सोळै आनां सांचौ वौ

सांची वे हवेल्यां

अर पराई पीड़ सींतौ हवेल्यां रौ भरम

रिनरोही में भंवतै मिरगलै री भांत

जुग-जूण जीवण

ऊंचावतौ रेह लाठी रा लटका

सोधतौ छींया

लिखणी चावै नुंवै जुगां रौ इतियास

बिलमाय खुद

पळटतौ बदळतौ आपरौ उणियारौ

बेकळ रेत हरियल खेत

ऊंडा अबूझ धोरा

पैछाण्या आंधी अर बथूळा

आपरै अधमरियै मिनखपणै नै

बांचतौ रैवै जूनै जुगां रौ इतियास

अणथक, अणटूट

लियां नुवै इतियास री आस

हांफतौ रेह! हांफतौ रेह हांफतौ रेह!

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : मीठेश निर्मोही ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : मार्च 1987
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