मिनख कितरौ लाचार है कै
तपियोड़ी माटी माथै
बरखा री पैली बूंदा सूं
उठती सुवास नै
रोकणौ चावै रूमाल ओट
नाक में बड़ण सूं।
कान व्हैतां थकां ई वो
बरखा री बूंदां रो संगीत
नीं सुण सकै
आंख्यां व्हैतां थकांई वो
कुदरत रै आपरूप हुलास नै
नदी नाळा मांय
उफणतौ नीं देख सकै
उणनै अणूंतौ डर लागै
मटमेलै पाणी नै परसण सूं।
मिनख ज्यूं-ज्यूं संपन्न हुवै
त्यूं-त्यूं आतमा सूं
दलिद्दर क्यूं होवण ढूकै?
अेक झूठै अहम री खोळ मांय
खुद नै कैद कर’र वो
सूखै रो रोवणौ रोया करै
अर चारूं मेर झरती
अमरत री बूंदां नै
अणदेखी करतौ रैवै
कितरो लाचार है मिनख कै
कांच रै घर मांय सूं ई
रितुवां सूं रोळ करणनै चावै
अर अेक दिन
कांच रै घर मांय ईज
रित जावै।