घोर अंधार
काळी-पीळी आंधी
धरती पै ज्यूं तूट्यौ आभौ
आंधी नै विकराळ कैयौ
धरती पर माथौ पटक-पटक
बाथां रेत उछाळै है।
धरती धूजी, रेत तिड़कगी
काळी-पीळी आंधी आई...
दांत कटकटावै, आंख्यां काढै
बीजळ मारै पळका
हर झूंपै री छत छूटी
रूंख उखड़ग्या, छप्पर उडग्या
जड़ां जोर रौ रुदन कियौ।
कइयां री गाबड़ अर चोंचां तूटी
पांख उखड़ग्या पंछियां रा
कुवां में जद रेत भराणी—
मुख पाणी रौ बंद व्हियौ।
घोना-बकरियां, ऊंट-सांयढ्यां
ढोर-डांगरा रै
पगां रौ सत छूट रैयौ
अबखी सांसां, थरथर कांपै
आंधी-हाथ घणा आकरा
आ आस अनाज, सब लूटै
खेतां री खोसै हरियाळी—
आंख्यां रौ आ काजळ मेटै
अंधियारौ भर दै आंख्यां में
माणस हिम्मत हर लेवै
काळा-पीळा चिरत करै
आ नाच नचावै रूंखां नै
उडता पानड़ा जांणै निरत करै
रेत छूट, सूंसाड़ करै जद
भीसण डर सिसकार करै,
रात ढळ्यां सूरज उतरै,
आभै में स्रिस्टी
रौ उजास भरै।