बोली म्हारी धार कटार

मूं कुणकी निजर चढूं

टूट्यो म्हारा चसमा को कांच

अब मूं कस्या पढूं?

दियो जो जुप्यो सुपना मं

कुणकी देहळ धरूं

नं मिल रही तीन कड़्यां

कब तक कड़ी आखरी ले’र फरूं।

स्रोत
  • पोथी : आंथ्योई नहीं दिन हाल ,
  • सिरजक : अम्बिकादत्त ,
  • प्रकाशक : बोधि प्रकाशन ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
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