सूरज सारै

उगाळी तपत री

लू री अबखाई सूं

हळाडोब करसो

जोवै आभौ

कदास मेहर

हो जावै

मेह री।

भूखै सांसरां री

सूनी आंख्यां

सतावै मन्नै

कदास बिरखा

नीं हुई तो

कांई हुवैला हाल-हवाल

म्हारा अर सांसरां रा।

बिरखा रूसगी

अर व्हीर हुय’र

पूगगी बठै

जठै पैल्यां सूं

घणी है बिरखा।

नदी-नाव अर

मल्लाह रो

निवड़ग्यो धीरज

घणी बिरखा सूं

पड़ग्यो है काळ बठै।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : श्याम महर्षि ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-33
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