जूण-अेक

डूंगर नै डंडोत करती नदी

जुगां सूं चालती जाय रैयी है, जूण री आ जातरा
डूंगर नै डंडोत करती नदी री गळाई।

आछा नखतरां रै पगफेरां में
सिजरण रा कूं-कूं पगळिया मांडती
धुरी मवड़ै रै मंगळ गीतां सागै
हालरिया हुलरांवती अर
टाबरां री उछरंग किलोळ नै
उमाव रा गाभा पैरांवती
चालती ई जाय रैयी है
जूण री आ जातरा, लगोलग, लगोलग, लगोलग।

साच, म्हानै चाईजै इसी जूण
जिकी होवै जामण रै दूध री जात निरमळ
नींदाळू आंख्यां में सुपनां री अडीक ज्यूं मीठी
अर करसां रै हळ री मूठ ज्यूं भरौसैमंद
बीज री मांयली ताकत रै तांण
जिकी अेक हरियै-भरियै रूंख रौ रचाव करै।

वौ देख, पग रोप’र ऊभौ
काळ नै झपेटा देंवतौ वौ जूनौ बड़लौ
लुगायां उणरै सूत लपेटै, आरती उतारै, डंडोत करै
सखरी जूण रौ अैनाण है ओ बड़लौ।
जूण री अणंत जातरा रो साखी

जींवतौ जागतौ सरूप है ओ बड़लौ।
किल-बिलांवता कीड़ा ज्यूं
दो-दिन बाद मुरझांवतै फूलां ज्यूं
जूण नै भोगणौ
कोई जीणै में जीणौ थोड़ै ई है।


 जूण-दोय

आतम-झाळ

स्रिस्टि री झणकार
सुणीजै दिन-रात
रचूं म्हैं आठूं पौर
बगत रै सुरताळ नै।
म्हारी आफळ रै उनमान
गावै जिन्दगी
बधावै रा सखरा गीत
लियां झरझरतौ सनेव
बजावै मीठी बांसुरी।

म्हैं हूं जीवट रो अैनाण
जे सामी मंडै
आंधी अर भतूळिया
पटकूं वानै झींटा झाल
न्हाखूं म्हैं धधकती आग में।

म्हारै डील में भरियौ है इस्पात
फौलादी है म्हारा हौंसला
कोनी बैठूं डाळा न्हाख
कोनी मनाऊं देवी-देवता
जूझुं म्हैं खुदरै तांण
जगाऊं आतम झाळ नै।
समदर ज्यूं मन में धीजो धार
थामूं किरणां रा म्हैं हाथ
लै’रां रै सागै रमूं रात-दिन
पण जे बण जाऊं विकराळ
समदर रै मांयलै तूफान ज्यूं
तोड़! ईं दिखावै रा सगळा बांध
पूरी करूंला इण भांत
जीवण री आ जातरा
रचैला म्हारी आ जूण
स्रिस्टि रै नूंवै अध्याय नै।

जूण-तीन

देसूंटै रै तांण

अठपौर लारौ कोनी छोडै
काळ री आ फरुकती धजा
अंतकाल तांई मन में घेरा घालता रैवै
इण जूण नै छोड’र
आगोतर रै रचाव में
देसूंटै रा भाव।

देसूंटौ कित्तो दोरौ है?
किंयां हुवै
मोहजाळ में फंसी छूटती काया रौ कळाप?
ओळूं रा सूत कातती यादां रा घेरा?
अर अंधारै में घिरोळा घालती
धारोधार तिस्णां री तीख?
भुगतै जिकौ ई जाणै।

पण मांदगी रै मांचै माथै
सांसां रा हिचकोळा खांवती
कदैई सधती, कदैई टूटती डोर वाळी
किन्नी ज्यूं
डोकरी अडीक रैयी है
मुगती रै मारग नै, का
देसूंटै में आगोतर रै रचाव नै।
छेकड़लै सांस री बेळा सारू
पागती मेल राखी है
गंगाजळ री सीसी,
रेणुका, तुळसीदळ, ठाकुर जी रौ परसाद
अर बिना टिमकारै री आंख में घालण सारू
सोनै री अेक टिकड़ी
आखर देसूंटै माथै जावणौ है
बैतरणी पार करणी है।
जूण री जातरा नै पूरी कर'र
का तो मुगत होवणौ है
का फंसणौ है पाछो
आगोतर में
मकड़ी रै नूंवै जाळ में
देसूंटै रै तांण।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : सुमन बिस्सा ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-27
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