जाणता-बूझता टिक्या है–

आपरी धरती सूं कट्या

अमूझता।

पिसीजै;

मरै।

इयां लागै जियां कै स्याई सूख्यां पैन हुवै।

चालैला, पण छिड़ेक्ये सूं।

वा छिड़काण स्याई रै छेड़लै टोपै री भी व्है सकै।

जद टिकैला?

कित्ताक?

टिक सकै;

जे समझै कै अेक टोप में जियो भी जा सकै;

कारण कै आपरी धरती सूं अेक होवण री बात

टोपै रौ उमर सारै माप है।

तो जियो जाणता-बूझता।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : ओम थानवी ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : अगस्त, अंक 06
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