कडवो तूंबो है जिन्दगी

अखूंट रस री लाळसा में

चाखै है मिनख

घणै चाव सूं

अर

थू-थू कर थूकै

ऊबका कर–कर

आखी उमर!

आखी उमर करता रैवै थू-थू

कोनी मिटै कड़वास—

जठै तक रैवै सांस!

कडवो तूंबो है जिन्दगी

पर

कीं मिनख हस'र

ताजी-ताजी रो कोनी चाखै रस

काढ़ नाखै

अहंकार रा सगळा बीज

सुखा देवै तप सूं

इण तूंबा नैं...

सेवा रो ठंडो टीप जळ भरै

तूंबा नै ठारै

अर खुद ठरै।

बणी रैवै मिनखां री

तूंबा में आस

बुझावै प्यास!

कडवो तूंबो है जिन्दगी

पण कीं मिनख जतन कर

बणाय देवै पूंगी

घणी कामणगारी

घणी मूंघी!

उपजावै

मीठा सुर काढ़ अनुराग

नाथ लेवै

कितरा-कितरा जहरीला नाग!

कडवो तूंबो है जिन्दगी

पण तो भोगै

उणरै सारै है

कै उणनै वापर

थू-थू कर ऊबका करै

कै ठारै है,

कानां रस झारै है।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : रामेश्वर दयाल श्रीमाली ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 23
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