तन तरेड़ां रो रोळो

मन मनसावां रो खटोलो

जिन्दगी मिली कै म्हानै खाली कचोळौ।

आंधी आवै मेघ गरजै

पल-पल अम्बर टूटै

बंजर धरती निपजै कोनी

बिरथा मनख पग पीटै

सपनां रै ठाणां में जमग्यौ, पाणी रो पाळो।

माल कठै दाम

ठप पड़ग्या है काम

गिणै सारा कळ पुरजा

बस मालिक रो नाम

काया रै कारखानै आयो, आत्मा रो गाळो।

बिकै बजारां बिपदा सारी

लेवां म्हे भी, है लाचारी

खुलै हाथ चैन बेचो

चैन रा मंगता भिखारी

लाबद्‌यां री कैद मिली, कुण जड़ दियो ताळो।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : रामधारी व्यथित ,
  • संपादक : दीनदयाल औझा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : फरवरी, अंक 12
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