(1)

आ पगडांडी—लांबी...लांबी...लांबी
माथा ऊपर दुख-दरदां रौ भारी भारी
आंटा...उलांटा...कांटा...भाटा
आकरौ तपतौ तावड़ौ
कठैई थोड़ी-सी छींया
कठैई थोड़ौ-सो पाणी—आ जिंदगाणी!

(2)

फिरती-घिरती फेरूं आवै
फुदकती-नाचती-सी उड़-उड़ जावै
लुक-छिप जावै
फूलां रै अैड़ै-छैडै भंवती
नीं जाणै कितरा रंग सांवटियोड़ी
तितळी दांई—थांरी याद

(3)

जिंदगाणी रिंधरोही
खेजड़ी, जाळ-जंजाळ
सुख रा दो-चार हरिया रूंख
बाकी सगळा कांटा-ई-कांटा
अणखणावतौ सरणाटौ तोड़ै
कदै-कदास कमेड़ी री गुटर-गूं
बूढा जाळ री खोखळ सूं
मूंडौ काढै जीभ लपलपावतौ
मौत रौ सांप—डरावतौ!

(4)

समंदर अथाग हिबोळा लेतौ
जीवण जूंझै लगोलग...
काळी-बोळी रात
सरणाटौ च्यारूं मेर
कोरौ तारां रौ आंख्यां चानणौ
फाट्योड़ौ पाल
फैलायोड़ी
तिरै अेक छोटी-सी नाव
आसा जिणरौ नाम!

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : बी. आर. प्रजापति ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : अगस्त 1987
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