अेक जूनी हवेली है—
याद
इणरै इतिहास नै
जाण्यां कांईं सरैला?
हवेली तांई जावौ
इणनै गौर सूं
देखौ-परखौ
इणमें थारै
अतीत रा
कैई पड़बिम्ब दीखैला।
हां, ये जर्जर गोखड़ा
जठै बैठ’र थे
भविस नै उडीकता हा
आज थांनै उडीकै है
अतीत रा संगी-साथी रै
रूप में
यां गोखड़ा मांय
ऊभा व्है’र देखो—
दूर-दूर तांईं
थांनै कीं नीं दीखैला
ओ कीं नीं ईज है
जिण मांय स्सैं कीं’ बसै है
देखण री ताब चाहिजै।
ये खज्योड़ी बार्यां
ये खर-बखर बारणा
ज्यां सूं कदेई थे नीसर्या
कदैई थांरी निजर
थां सूं बंतळ करणी चावै
थे ढबौ तो खरी
इतरी कांई उतावळ है
वर्तमान में जावण री
अंत के तंत
हरेक वर्तमान
अतीत बण जाया करै है।
कदै उण धोरां मांय भी
हालौ, जिणरै हेठै
थांरी कामनावां री
कूंपळां विगसी ही
वै आज भी इण
रेत रै समंदर हेठै
दबियोड़ी थांनै
हेला पाड़ै है।
इणी’ज रेत रै
पसराव पींदै
यादां री अेक अखूट
इमरत धार
आज भी बै’वै है
याद री इण
इमरतधार नै ओळखौ
इण इमरतधार रै साथै
थे अेक जूण बिताई है
आज थे उण सगळी बातां
नै
बिसराय’र
भागणौ चावौ हो
बस अड्डै कानी
जठै थांरै सै’र
जावण वाळी
बस ऊभी है!
थे नीं जाणौ कै–
सै’र पूग्यां पछै भी
रेत रा ये धोरा
या जूनी हवेली
ये जर्जर गोखड़ा
ये खज्योड़ी
बार्यां-बारणा
थांरौ लारौ नीं छोडैला
क्यूं कै ये सगळा थांरै
हियै मांय बसै है
सांसा रै उनवांन।